मनुष्य का जीवन केवल शरीर, मन और आत्मा का मेल नहीं है बल्कि यह एक बहुत जटिल ऊर्जा-प्रणाली है, जो कभी हमें सामान्य संसार की सीमाओं में बाँधकर रखती है और कभी अचानक उस सीमा को तोड़कर हमें अनंत चेतना की झलक दिखा देती है, और जब यह सीमा टूटती है तो व्यक्ति दो तरह के अनुभवों से गुजर सकता है – एक तरफ़ वह अपार दिव्यता और शांति की ओर जा सकता है जिसे हम कुण्डलिनी जागरण या आध्यात्मिक उत्कर्ष कहते हैं, और दूसरी तरफ़ वही प्रक्रिया उसे मानसिक असंतुलन, डर, भ्रम और टूटन की ओर भी धकेल सकती है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान सिज़ोफ्रेनिया कहता है; यही कारण है कि कई लोग जब अपने भीतर की ऊर्जा को जाग्रत होते हुए अनुभव करते हैं तो वे नहीं समझ पाते कि यह कोई बीमारी है या कोई वरदान, क्योंकि दोनों अवस्थाओं में लक्षण शुरू में बहुत मिलते-जुलते हैं — जैसे अचानक तेज़ ऊर्जा का अनुभव होना, शरीर में झनझनाहट, अजीब आवाज़ें या दृश्य दिखना, विचारों का बाढ़ की तरह उमड़ना, अचानक रोना-हँसना, गहरी शांति या फिर अचानक भय और घबराहट, आत्मा से अलगाव का अनुभव या फिर भीतर ईश्वर से जुड़ाव का अहसास, और यही द्वंद्व लोगों को उलझा देता है; लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो कुण्डलिनी जागरण और सिज़ोफ्रेनिया दोनों में मूल फर्क यह है कि कुण्डलिनी हमें चेतना के उच्च स्तर पर ले जाती है, जबकि सिज़ोफ्रेनिया हमें उसी चेतना की गड़बड़ी और असंतुलन में फँसा देता है; उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी व्यक्ति के जीवन में बहुत दबा हुआ दुःख, गुस्सा या आघात (trauma) है, यह सब हमारे अवचेतन (subconscious) और शरीर की नसों और मांसपेशियों में भी छिपा होता है, और जैसे ही कुण्डलिनी ऊर्जा ऊपर उठती है, वह इन दबे हुए भावों को सतह पर ला देती है ताकि वे जलकर समाप्त हो जाएँ, अब अगर व्यक्ति इस प्रक्रिया को समझ लेता है और ध्यान, प्राणायाम, या गुरु के मार्गदर्शन से इसे संभाल लेता है, तो वही पीड़ा आनंद और शांति में बदल जाती है, लेकिन अगर वह व्यक्ति घबरा जाता है और सोचता है कि उसके साथ कुछ “गलत” हो रहा है, तो वह उस दर्द, भ्रम और डर में फँस जाता है और धीरे-धीरे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है — यही स्थिति सिज़ोफ्रेनिया जैसी दिखती है; इसलिए बहुत से मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विद्वान मानते हैं कि सिज़ोफ्रेनिया और कुण्डलिनी जागरण दोनों एक ही ऊर्जा की दो अलग-अलग दिशाएँ हैं, फर्क सिर्फ़ यह है कि ऊर्जा को हम कैसे संभालते हैं; अब ज़रा इसे और आसान भाषा में समझें — जब बिजली तारों से होकर बहती है, और तार ठीक-ठाक हैं, तो वही बिजली बल्ब को रोशन कर देती है, लेकिन अगर तार जले हुए हों, टूटी हुई हों या शॉर्ट-सर्किट हो, तो वही बिजली आग या विस्फोट का कारण बन सकती है; इसी तरह कुण्डलिनी की ऊर्जा भी है, अगर हमारे शरीर-मन की तैयारी है, साधना और संतुलन है, तो यह हमें रोशनी और आत्मज्ञान तक ले जाती है, लेकिन अगर तैयारी नहीं है, दबे हुए भावनात्मक घाव बहुत गहरे हैं, और व्यक्ति के पास मार्गदर्शन नहीं है, तो वही ऊर्जा मानसिक बीमारी की तरह दिख सकती है; यही कारण है कि प्राचीन भारत में हमेशा कहा गया कि कुण्डलिनी जागरण का मार्ग अकेले नहीं चलना चाहिए, बल्कि गुरु या अनुभवी साधक के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि गुरु हमें समझाते हैं कि जब भीतर से अजीब आवाज़ें, आकृतियाँ, रोशनी या भावनाएँ उठें तो उन्हें डर या पागलपन न समझकर शुद्धिकरण की प्रक्रिया समझना है; आधुनिक मनोविज्ञान में भी सिज़ोफ्रेनिया के कई लक्षण समझाए गए हैं — जैसे विचारों का बिखर जाना, अपने-आप से बात करना, काल्पनिक आवाज़ें सुनना, दूसरों पर शक करना, या अपनी ही दुनिया में खो जाना, लेकिन अगर आप गौर से देखेंगे तो यह सब कुछ एक तरह की “ऊर्जा का ओवरलोड” है जिसे दिमाग और नर्वस सिस्टम संभाल नहीं पाता; अब ज़रा तुलना करें कि कुण्डलिनी जागरण में भी यही होता है, दिमाग और नसें ऊर्जा की बाढ़ को अनुभव करती हैं, लेकिन अगर साधक अपने शरीर और मन को साधना, ध्यान, प्राणायाम, स्वस्थ आहार और जीवनशैली से संतुलित रखता है तो वही ऊर्जा एक संगीत की तरह व्यवस्थित होकर भीतर आनंद, प्रेम और शांति का संचार करती है; इसी को संत और योगी “आनंदमय कोष” कहते हैं यानी शरीर का वह आवरण जो आनंद से बना है; लेकिन अगर संतुलन न हो, तो वही ऊर्जा “भ्रम” और “डर” पैदा कर देती है; इसलिए कई बार कहा जाता है कि कुण्डलिनी और सिज़ोफ्रेनिया के बीच की रेखा बहुत पतली है, और साधक को यह रेखा पहचाननी चाहिए; वास्तव में फर्क इतना है कि कुण्डलिनी साधना हमें अपने दर्द और भ्रम का सामना करना सिखाती है और उन्हें पार करके आत्मा की रोशनी तक ले जाती है, जबकि सिज़ोफ्रेनिया में व्यक्ति उसी भ्रम और पीड़ा में फँसकर रह जाता है; इसलिए अगर आपके जीवन में कभी अचानक बहुत तेज़ भावनाएँ, अजीब अनुभव या भय और आनंद की मिश्रित अनुभूतियाँ होने लगें, तो डरने के बजाय समझना चाहिए कि यह ऊर्जा की प्रक्रिया है, इसे सही मार्गदर्शन और अभ्यास से संभाला जा सकता है; साधारण भाषा में कहें तो — कुण्डलिनी जागरण वह प्रक्रिया है जिसमें हम अपने भीतर की “फंसी हुई ऊर्जा” को मुक्त करके आत्मा से जुड़ते हैं, और सिज़ोफ्रेनिया वह स्थिति है जब वही ऊर्जा हमें भ्रम और असंतुलन में कैद कर देती है; फर्क बस दृष्टिकोण, तैयारी और मार्गदर्शन का है; यही कारण है कि प्राचीन ऋषियों ने इस ऊर्जा को “सर्प” कहा जो कुंडली मारकर बैठी रहती है — अगर सर्प को धीरे-धीरे, मंत्रों और साधना से जगाया जाए तो वह रक्षक बनता है, और अगर अचानक छेड़ दिया जाए तो वह डस भी सकता है; आज के विज्ञान और मनोविज्ञान को भी यह समझने की ज़रूरत है कि हर मानसिक असंतुलन केवल बीमारी नहीं होता, बल्कि कभी-कभी यह चेतना की उच्च अवस्था का संकेत भी होता है, जिसे हम अगर सही दिशा दें तो यह रोग नहीं बल्कि योग बन सकता है; इसलिए सच्चाई यही है कि कुण्डलिनी और सिज़ोफ्रेनिया दो अलग-अलग रास्ते हैं जो एक ही दरवाज़े से निकलते हैं, फर्क इतना है कि एक हमें भीतर की अंधेरी कैद में डाल देता है और दूसरा हमें भीतर के सूर्य की रोशनी तक पहुँचा देता है।
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